UP Reservation Fact Check: उत्तर प्रदेश में सरकारी भर्तियों और आरक्षण व्यवस्था को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार कई गंभीर दावे किए जा रहे हैं। कुछ पोस्ट में ‘आरक्षण घोटाला’, ‘OBC के पदों पर डाका’ और ‘आरक्षण खत्म’ जैसे दावे किए गए हैं। इन्हीं दावों से जुड़े एक दस्तावेज में कई भर्तियों और आरक्षण प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। इन दावों में कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती, पशु चिकित्सा अधिकारी, स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी, समीक्षा अधिकारी- सहायक समीक्षा अधिकारी, खंड शिक्षा अधिकारी और लोअर PCS जैसी भर्तियों का जिक्र है।
क्या है पूरा मामला?
प्रयागराज में रहकर सरकारी भर्ती की तैयारी करने वाले मुकेश कुमार वर्मा (@mukeshdeshka) के सोशल मीडिया पोस्टों को लेकर तैयार किए गए चार पन्नों के दस्तावेज में आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश की अलग-अलग सरकारी भर्तियों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर भ्रामक दावे किए जा रहे हैं।
Factgiri ने मुकेश कुमार वर्मा के X पोस्ट में किए गए दावों को अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड, उत्तर प्रदेश के आरक्षण कानून और उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों से मिलाकर देखा। पड़ताल में सामने आया कि कुछ मामलों में आरक्षण को लेकर वास्तविक विवाद जरूर है और कुछ मामले अदालत तक भी पहुंचे हैं। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह कहना कि ‘उत्तर प्रदेश में आरक्षण खत्म कर दिया गया’ या ‘OBC-SC के पदों पर डाका साबित हो गया’, अभी सही निष्कर्ष नहीं है।
सबसे पहले समझिए, मुकेश कुमार वर्मा ने क्या आरोप लगाया?
मुकेश कुमार वर्मा ने अपने X पोस्ट में उत्तर प्रदेश की अलग-अलग सरकारी भर्तियों के आंकड़े साझा करते हुए सवाल उठाया कि आरक्षण के तय हिस्से के मुताबिक OBC, SC और ST वर्ग को जितने पद मिलने चाहिए थे, उतने पद क्यों नहीं दिए गए।
उनके पोस्ट में ‘आरक्षण घोटाला’, ‘आरक्षण खत्म’, ‘OBC का आरक्षण शून्य’ और ‘SC के आरक्षित पदों पर डाका’ जैसे दावे किए गए हैं।
इन दावों का आधार मुख्य रूप से भर्ती में घोषित कुल पदों और अलग-अलग वर्गों के लिए दिए गए पदों की तुलना है। यहीं से इस पूरे मामले की असली पड़ताल शुरू होती है।
दावा-1: क्या समान कटऑफ का मतलब आरक्षण खत्म हो गया?
मुकेश कुमार वर्मा ने एक पोस्ट में लोअर PCS 2025 की कटऑफ को लेकर सवाल उठाया और अलग-अलग आरक्षित वर्गों की समान कटऑफ को आरक्षण व्यवस्था से जोड़कर देखा। सोशल मीडिया पर ऐसी स्थिति को कई बार इस दावे के साथ शेयर किया जाता है कि अगर सामान्य और आरक्षित वर्ग की कटऑफ समान है तो आरक्षण का कोई फायदा नहीं रह गया या आरक्षण खत्म कर दिया गया।
Fact Check: यह निष्कर्ष सही नहीं है
कटऑफ और आरक्षण दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी परीक्षा के किसी चरण में दो या अधिक वर्गों की कटऑफ समान होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरक्षण खत्म कर दिया गया है।
कटऑफ उस परीक्षा में अगले चरण के लिए उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने से जुड़ी होती है, जबकि आरक्षण भर्ती में पदों के वितरण और चयन प्रक्रिया से जुड़ा अलग विषय है।
इसलिए केवल कटऑफ के आंकड़े देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि ‘आरक्षण समाप्त कर दिया गया’, तथ्यात्मक रूप से पर्याप्त नहीं है।
यानी इस दावे को सिर्फ कटऑफ के आधार पर सही नहीं माना जा सकता।
दावा-2: कुल पदों में आरक्षण प्रतिशत के हिसाब से पद कम हैं
मुकेश कुमार वर्मा ने कृषि प्राविधिक सहायक समेत कई भर्तियों में कुल पदों और आरक्षण के प्रतिशत की तुलना करते हुए सवाल उठाया है कि OBC और SC को उनके तय हिस्से के मुताबिक पद क्यों नहीं मिले।
यह दावा पहली नजर में गणित के आधार पर सही लग सकता है, लेकिन सरकारी भर्ती में आरक्षण की गणना इतनी सीधी नहीं होती कि कुल पद × आरक्षण प्रतिशत कर दिया जाए और वही अंतिम श्रेणीवार पद मान लिए जाएं।
Fact Check: केवल प्रतिशत से पूरी तस्वीर नहीं मिलती
उत्तर प्रदेश में SC, ST और OBC के लिए आरक्षण का प्रावधान उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 में किया गया है। यह कानून India Code पर उपलब्ध है।
लेकिन किसी खास भर्ती में पदों का वास्तविक वितरण देखने के लिए सिर्फ प्रतिशत नहीं, बल्कि कैडर, रोस्टर, पदों की स्थिति और संबंधित भर्ती के विज्ञापन में दिए गए श्रेणीवार पद देखना जरूरी होता है।
यानी अगर किसी भर्ती में कुल 100 पद हैं तो सिर्फ 27 प्रतिशत OBC या 21 प्रतिशत SC का हिसाब लगाकर यह घोषित नहीं किया जा सकता कि उतने ही पद उसी भर्ती में आरक्षित होने चाहिए थे।
यही वजह है कि ‘कुल पद × आरक्षण प्रतिशत = वास्तविक आरक्षित पद’ वाला फार्मूला अकेले भर्ती में आरक्षण की गड़बड़ी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में 588 पदों की कटौती का दावा कितना सही?
मुकेश कुमार वर्मा के अलावा राजनीतिक दलों की ओर से भी कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में आरक्षण को लेकर सवाल उठाए गए हैं। जुलाई 2026 में आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि 2,759 पदों वाली कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में OBC, SC और ST के 588 पद कम हुए। इसी तरह समाजवादी पार्टी की ओर से भी अलग-अलग सरकारी भर्तियों में आरक्षित पद प्रभावित होने का दावा किया गया। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है।
अमर उजाला की 25 मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक UPSSSC ने कृषि विभाग में प्राविधिक सहायक ग्रुप-C के 2,759 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था।
इससे यह तो साफ है कि भर्ती और उसके पदों की संख्या वास्तविक है। लेकिन 588 पद कम होने का दावा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरक्षण कानून का उल्लंघन हुआ। इसके लिए संबंधित भर्ती का पूरा रोस्टर और लागू आरक्षण व्यवस्था देखना जरूरी है।
एक और जरूरी तथ्य
सोशल मीडिया पर कृषि प्राविधिक सहायक के 3,446 पदों को लेकर भी आरक्षण की गणना वायरल हुई है। लेकिन यह आंकड़ा एक अलग भर्ती चक्र से जुड़ा है। उपलब्ध भर्ती रिकॉर्ड में 3,446 पदों के लिए श्रेणीवार संख्या UR 1,813, SC 509, ST 151, OBC 629 और EWS 344 दी गई थी।
इसलिए 3,446 पदों के पुराने आंकड़े और 2026 की 2,759 पदों वाली भर्ती को एक ही भर्ती मानकर तुलना करना भी सही नहीं होगा।
Fact Check: कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में आरक्षण को लेकर राजनीतिक और सोशल मीडिया आरोप वास्तविक हैं, लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड से अकेले यह साबित नहीं होता कि 588 पदों की कमी ‘आरक्षण घोटाला’ है।
दावा-3: क्या OBC का आरक्षण शून्य कर दिया गया?
मुकेश कुमार वर्मा के पोस्ट में कुछ भर्तियों को लेकर OBC आरक्षण को बेहद कम या शून्य किए जाने जैसे दावे किए गए हैं।
लेकिन किसी भर्ती में OBC उम्मीदवारों की संख्या कम या ज्यादा होना और OBC आरक्षण खत्म कर देना, दोनों अलग बातें हैं।
यह देखने के लिए कि OBC आरक्षण वास्तव में लागू हुआ या नहीं, भर्ती के विज्ञापन, रोस्टर और अंतिम चयन सूची को एक साथ देखना होगा।
इसलिए केवल किसी एक आंकड़े या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर यह कहना कि ‘OBC आरक्षण शून्य कर दिया गया’, उपलब्ध प्रमाण से साबित नहीं होता।
दावा-4: माइग्रेशन के जरिए OBC-SC के पदों पर डाका?
आरक्षण विवाद का एक बड़ा हिस्सा माइग्रेशन से जुड़ा है। आसान भाषा में समझें तो अगर आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार सामान्य/ओपन मेरिट में अपने प्रदर्शन के आधार पर चयनित होता है, तो उसे आरक्षित कोटे की सीट के बजाय ओपन सीट पर समायोजित करने का सवाल उठता है।
यह कोई सोशल मीडिया से निकला नियम नहीं है।
India Code पर उपलब्ध उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम, 1994 इस व्यवस्था से संबंधित कानूनी प्रावधान देता है। कानून की धारा 3 में आरक्षण का प्रावधान है और मेरिट से चयनित आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के समायोजन को लेकर कानूनी व्यवस्था मौजूद है।
यानी ‘माइग्रेशन’ शब्द सुनते ही इसे घोटाला मान लेना सही नहीं है। हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि माइग्रेशन को लेकर कोई विवाद नहीं है।
UPPSC की माइग्रेशन नीति पर अदालत में क्या हुआ?
यहां मुकेश कुमार वर्मा के आरोपों में एक महत्वपूर्ण हिस्सा वास्तविक कानूनी विवाद से जुड़ता है। द टाइम्स ऑफ इंडिया की 9 मई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने RO/ARO 2023 भर्ती में आरक्षण और माइग्रेशन से जुड़े विवाद के बीच सफल उम्मीदवारों की आगे की जॉइनिंग पर अंतरिम रोक लगाई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि कुछ OBC उम्मीदवारों के प्रारंभिक परीक्षा में अंक सामान्य वर्ग के कुछ चयनित उम्मीदवारों से ज्यादा थे, फिर भी उन्हें मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित नहीं किया गया।
इसके बाद द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 13 मई 2026 को रिपोर्ट किया कि डिवीजन बेंच ने मामले को दोबारा सिंगल जज बेंच के पास भेज दिया और नई नियुक्तियों पर अंतरिम रोक जारी रही। यानी मामला अभी कानूनी जांच के दायरे में था।
इससे एक बात साफ है- माइग्रेशन और आरक्षण को लेकर विवाद वास्तविक है। लेकिन अदालत में विवाद चलना और ‘आरक्षण घोटाला साबित हो गया’, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
RO-ARO भर्ती में OBC को 42% प्रतिनिधित्व का दावा क्या बताता है?
RO/ARO 2023 भर्ती को लेकर भी सोशल मीडिया पर आरक्षण संबंधी सवाल उठाए गए हैं। द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक UPPSC ने RO/ARO भर्ती के बचाव में कहा था कि अंतिम चयन में OBC उम्मीदवारों की संख्या करीब 42 प्रतिशत रही। कुल 419 चयनित उम्मीदवारों में 176 OBC उम्मीदवार थे, जबकि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 28.16 प्रतिशत बताई गई।
वहीं एक दूसरी TOI रिपोर्ट के अनुसार 5 अप्रैल 2026 को RO/ARO 2023 का अंतिम परिणाम घोषित किया गया था और कुल 419 उम्मीदवारों का चयन हुआ।
इसका मतलब यह नहीं कि आरक्षण से जुड़ा विवाद खत्म हो गया। अदालत ने मामले को मेरिट पर सुनवाई के लिए वापस भेजा था। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि पूरे मामले को सिर्फ ‘OBC के पद छीन लिए गए’ कहकर समझना अधूरा होगा।
फिर मुकेश कुमार वर्मा के आरोपों में कितना दम है?
पूरी पड़ताल के बाद तस्वीर को तीन हिस्सों में समझना ज्यादा सही होगा।
पहली बात- आरक्षण को लेकर विवाद वास्तविक है
कृषि प्राविधिक सहायक समेत कई भर्तियों में राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों ने आरक्षण को लेकर सवाल उठाए हैं। कुछ मामलों में ये विवाद अदालत तक पहुंचे हैं। इसलिए यह कहना कि ‘आरक्षण को लेकर कोई विवाद ही नहीं है’, सही नहीं होगा।
दूसरी बात- हर आरोप को घोटाला साबित मानना भी सही नहीं
किसी सोशल मीडिया पोस्ट में यह लिखे जाने से कि OBC या SC के इतने पद कम हो गए, यह अपने आप साबित नहीं होता कि भर्ती में कानून का उल्लंघन हुआ।
इसके लिए संबंधित भर्ती का आधिकारिक रोस्टर और चयन रिकॉर्ड देखना जरूरी है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात, आरक्षण खत्म होने का दावा उपलब्ध रिकॉर्ड से साबित नहीं होता। उत्तर प्रदेश का 1994 का आरक्षण कानून आज भी लागू कानूनी ढांचे का हिस्सा है और India Code पर उपलब्ध है।
इसलिए किसी एक भर्ती की कटऑफ, पदों की गणना या माइग्रेशन विवाद को पूरे उत्तर प्रदेश में ‘आरक्षण खत्म’ होने के प्रमाण के रूप में पेश करना सही नहीं है।
Fact Check: वायरल दावों की हकीकत
| वायरल दावा | पड़ताल में क्या मिला | फैसला |
|---|---|---|
| समान कटऑफ का मतलब आरक्षण खत्म | कटऑफ और आरक्षण अलग-अलग विषय हैं | भ्रामक |
| कुल पदों पर प्रतिशत लगाने से आरक्षित पद तय हो जाते हैं | रोस्टर और भर्ती के नियम भी महत्वपूर्ण हैं | अधूरा दावा |
| कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में 588 पद कम होने का आरोप | ऐसा राजनीतिक आरोप सामने आया है, लेकिन इससे अकेले आरक्षण उल्लंघन साबित नहीं होता | अप्रमाणित आरोप |
| माइग्रेशन अपने आप में आरक्षण घोटाला है | कानून में मेरिट से चयनित आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के open category में जाने की व्यवस्था मौजूद है | भ्रामक |
| UPPSC की माइग्रेशन नीति को लेकर कोई विवाद नहीं | RO/ARO भर्ती में मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और अंतरिम आदेश भी हुए | गलत |
| UP में OBC-SC आरक्षण खत्म कर दिया गया | उपलब्ध कानून और रिकॉर्ड से ऐसा साबित नहीं होता | भ्रामक |
रोस्टर सिस्टम क्या है?
उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 की धारा 3(5) के अनुसार आरक्षण रोस्टर प्रणाली से लागू होता है।
रोस्टर कैडर की कुल मंजूरी प्राप्त पदों पर आधारित होता है। यह “रनिंग अकाउंट” की तरह चलता है। हर नई रिक्ति रोस्टर के अगले बिंदु से भरी जाती है।
इसलिए किसी एक विज्ञापन में आरक्षित पद बिल्कुल 27 प्रतिशत या 21 प्रतिशत नहीं आते। कभी कम, कभी ज्यादा हो सकते हैं।
सिर्फ कुल रिक्तियों पर प्रतिशत लगाकर गणना करना कानूनी रूप से सही तरीका नहीं है।
माइग्रेशन नीति (धारा 3(6)) के अनुसार यदि आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी खुली प्रतियोगिता में मेरिट पर चयनित होता है तो उसे आरक्षित सीट में नहीं गिना जाता। यह व्यवस्था संवैधानिक है, हालांकि इसके लागू करने के चरण (प्रारंभिक/मुख्य/अंतिम) को लेकर अदालतों में मामले चलते रहते हैं।
Fact Check Verdict: भ्रामक
मुकेश कुमार वर्मा ने अपने X पोस्ट में उत्तर प्रदेश की सरकारी भर्तियों में आरक्षण को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। इन सवालों में से कुछ वास्तविक भर्ती विवादों और अदालत में चल रहे मामलों से जुड़े हैं। खासकर RO/ARO भर्ती में आरक्षण और माइग्रेशन को लेकर हाईकोर्ट की कार्यवाही इसका उदाहरण है।
लेकिन दूसरी तरफ, ‘आरक्षण खत्म कर दिया गया’, ‘OBC-SC के पदों पर डाका पड़ गया’ या ‘आरक्षण घोटाला साबित हो गया’ जैसे व्यापक निष्कर्ष उपलब्ध रिकॉर्ड से अभी स्थापित नहीं होते।
कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में 588 पद कम होने का दावा भी फिलहाल एक राजनीतिक/सोशल मीडिया आरोप के रूप में रिपोर्ट किया जाना ज्यादा सही है, जब तक संबंधित रोस्टर और सक्षम प्राधिकरण की ओर से इस पर अंतिम पुष्टि या फैसला सामने न आए। उपलब्ध रिपोर्टों में इस आरोप को राजनीतिक नेताओं के बयान के रूप में ही पेश किया गया है।
इसलिए वायरल पोस्ट को ‘आरक्षण घोटाला साबित’ के रूप में शेयर करना भ्रामक होगा। सही तस्वीर यह है कि उत्तर प्रदेश की कुछ भर्तियों में आरक्षण, रोस्टर और माइग्रेशन को लेकर गंभीर सवाल और कानूनी विवाद मौजूद हैं, लेकिन इन विवादों से पूरे राज्य में आरक्षण खत्म होने या OBC-SC के पदों पर डाका पड़ने की पुष्टि नहीं होती।
Fact Check का रिजल्ट
आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सिर्फ सोशल मीडिया की पोस्ट या किसी एक गणना के आधार पर निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। किसी भर्ती में वास्तव में आरक्षण नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं, यह जानने के लिए मूल भर्ती विज्ञापन, श्रेणीवार पद, रोस्टर, अंतिम चयन सूची और संबंधित अदालत या आयोग के आदेश को साथ में देखना जरूरी है।
Factgiri की पड़ताल में वायरल ‘आरक्षण घोटाला’ वाला दावा पर्याप्त प्रमाण के बिना और भ्रामक पाया गया। हालांकि, जिन भर्तियों को लेकर सवाल उठाए गए हैं, उनमें से कुछ मामलों में विवाद वास्तविक है और न्यायिक प्रक्रिया भी चल रही है।
MISLEADING/ भ्रामक
स्रोत और क्रॉस-वेरिफिकेशन:
- India Code पर उपलब्ध उत्तर प्रदेश लोक सेवा आरक्षण अधिनियम, 1994 से कानूनी प्रावधानों का मिलान किया गया।
- द टाइम्स ऑफ इंडिया की मई 2026 की रिपोर्टों से RO/ARO भर्ती में आरक्षण और माइग्रेशन विवाद तथा हाईकोर्ट की कार्यवाही का मिलान किया गया।
- अमर उजाला की मार्च 2026 की रिपोर्ट से कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में 2,759 पदों वाले विज्ञापन की जानकारी का मिलान किया गया।
- कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती में 588 पद कम होने के आरोप को Tarun Mitra, The Hohalla और Amar Ujala में प्रकाशित राजनीतिक बयानों से क्रॉस-चेक किया गया।
- 3,446 पदों वाली पिछली कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती के श्रेणीवार आंकड़ों का उपलब्ध भर्ती रिकॉर्ड से मिलान किया गया।




