200 करोड़ का बजट, 860 करोड़ स्वाहा! लखनऊ के बीचों-बीच खड़ी है अखिलेश राज के भ्रष्टाचार की अट्टालिका
राजनीति में झूठ की उम्र बहुत लंबी नहीं होती और हाल ही में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस सच को एक बार फिर साबित कर दिया है। उनके द्वारा योगी आदित्यनाथ सरकार पर जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र (JPNIC) को तबाह करने का आरोप मढ़ना और जेपी के सम्मान को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करना, हकीकत के पन्नों को पलटते ही पूरी तरह खोखला नजर आने लगता है।
नींव में ही भ्रष्टाचार का सीमेंट
सच तो यह है कि जिस जेपीएनआईसी की बदहाली का रोना अखिलेश आज रो रहे हैं, उसकी नींव में ही भ्रष्टाचार का सीमेंट लगा था। साल 2012 से 2017 के बीच सपा सरकार ने जिस बेरहमी से इस प्रोजेक्ट को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और वित्तीय कुप्रबंधन की भेंट चढ़ाया, आज उसका हिसाब देने के बजाय वे विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं।
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भ्रष्टाचार की अंतहीन सुरंग बन गया प्रोजेक्ट
जेपीएनआईसी की परिकल्पना लखनऊ को वैश्विक मंच पर चमकाने के लिए एक ऐसे केंद्र के रूप में की गई थी, जहां विश्वस्तरीय कन्वेंशन सेंटर, खेल परिसर, ऑडिटोरियम और सांस्कृतिक मंच होता। लोकनायक जय प्रकाश नारायण जैसे महापुरुष के नाम पर साल 2013 में इसकी शुरुआत हुई और लखनऊ के लिए यह बेहद गर्व की बात हो सकती थी, बशर्ते सपा सरकार के इरादे नेक होते। लेकिन यह प्रोजेक्ट शुरू होते ही भ्रष्टाचार की एक अंतहीन सुरंग बन गया।
वीआईपी इलाके में अरबों रुपए का कंक्रीट का खंडहर
जिस परियोजना का शुरुआती अनुमान मात्र 200 से 265 करोड़ रुपये के आसपास था, उस पर मार्च 2017 तक 860 करोड़ रुपये से अधिक फूंक दिए गए। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि 821 करोड़ रुपये से ज्यादा की सरकारी रकम ठेकेदारों और दलालों की जेब में जाने के बावजूद जमीन पर न ऑडिटोरियम तैयार हुआ, न स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और न ही मल्टी-लेवल पार्किंग बन पाई। सपा सरकार जनता को एक चमचमाता हुआ केंद्र देने के बजाय लखनऊ के वीआईपी इलाके में अरबों रुपयों का एक कंक्रीट का खंडहर सौंपकर सत्ता से विदा हो गई।
कैग ने भी उठाये थे सवाल
यह कोई महज राजनीतिक आरोप नहीं है, बल्कि देश की सबसे बड़ी ऑडिट संस्था नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट की कड़वी सच्चाई है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि इस प्रोजेक्ट में नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर बिना किसी टेंडर के काम बांटे गए और लागत को जानबूझकर बढ़ाया गया ताकि मलाई का दायरा बड़ा हो सके।

अपारदर्शी ढंग से हुआ फंड का आवंटन और खर्च
सपा शासनकाल में गठित जेपीएनआईसी सोसाइटी इस पूरी वित्तीय अराजकता का मुख्य अड्डा बनी रही, जहां फंड का आवंटन और खर्च इतना अपारदर्शी था कि उसमें से सीधे तौर पर सरकारी धन की लूट की बू आ रही थी। जो जय प्रकाश नारायण जीवनभर भ्रष्टाचार, तानाशाही और राजशाही के खिलाफ लड़ते रहे, अखिलेश सरकार ने उन्हीं के नाम के प्रोजेक्ट को परिवारवाद की राजनीति और संगठित लूट का प्रतीक बना दिया।
सीएम योगी ने निकाला समाधान
सपा सरकार जहां समस्या छोड़कर गई थी, योगी आदित्यनाथ सरकार ने वहां से समाधान का रास्ता निकाला। जुलाई 2025 में योगी कैबिनेट ने इस सफेद हाथी बन चुके प्रोजेक्ट को लेकर एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला लेते हुए भ्रष्टाचार की जड़ बन चुकी जेपीएनआईसी सोसाइटी को तुरंत भंग कर दिया और पूरी परियोजना की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) को सौंप दी। वित्तीय अनुशासन तय करने के लिए अब तक जारी किए गए 821.74 करोड़ रुपये को एलडीए के पक्ष में एक ऋण मान लिया गया है, जिसे अगले 30 वर्षों में चुकाना होगा ताकि सरकारी खजाने पर कोई नया बोझ न पड़े।

IGP की तर्ज पर विकसित होगा JPNIC
इसके साथ ही, एलडीए को पीपीपी मॉडल के जरिए निजी सहभागिता से इसे पूरा करने का अधिकार दिया गया है, जिससे बिना किसी अतिरिक्त सरकारी खर्च के इस खंडहर को पुनर्जीवित किया जा सके। इसका संचालन इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान की तर्ज पर होगा और पूरा होने के बाद इसमें राज्य स्तर का ऑडिटोरियम, अंतरराष्ट्रीय स्तर का कन्वेंशन सेंटर, आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और 750 वाहनों की मल्टी-लेवल पार्किंग होगी, जो लखनऊ की जनता के लिए एक जीवंत केंद्र बनेगा।
खुल रहीं वित्तीय कुप्रबंधन की परतें
अखिलेश यादव अब राजनीतिक लाभ के लिए आरोप लगा रहे हैं कि योगी सरकार इस धरोहर को निजी हाथों में बेच रही है, लेकिन उनके इस तर्क में कोई दम नहीं है। सवाल सीधा है कि अगर अखिलेश जी को इस प्रोजेक्ट और जेपी के सम्मान की इतनी ही फिक्र थी, तो उन्होंने 2017 तक इसे पूरा क्यों नहीं किया और 860 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी आधी-अधूरी दीवारें क्यों खड़ी छोड़ दीं। साफ है कि आज जब योगी सरकार इसे एक पारदर्शी, पेशेवर और आत्मनिर्भर मॉडल के जरिए पूरा करने जा रही है, तो सपा नेताओं को दर्द इस बात का है कि उनके समय के वित्तीय कुप्रबंधन की परतें खुल रही हैं।
सपा काल का वो दाग जिसे धोना मुमकिन नहीं
आंकड़े झूठ नहीं बोलते और जनता अब बहकावे में आने वाली नहीं है क्योंकि 200 करोड़ के बजट को 860 करोड़ पहुंचाकर भी काम अधूरा छोड़ना समाजवादी शासनकाल का वो दाग है जिसे धोना मुमकिन नहीं है। योगी सरकार ने जेपीएनआईसी को आगे की लूट से बचाकर इसे लखनऊ की नई पहचान बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा दिए हैं, और अखिलेश यादव को अब यह समझना होगा कि खुद आग लगाकर धुएं पर राजनीति करने का दौर बीत चुका है।




