Factgiri Fact Check: शाहजहांपुर में दो साधुओं की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर घटना को जातीय रंग देते हुए योगी सरकार और पुलिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सपा मीडिया सेल की एक पोस्ट में आरोपी सुमित सिंह के नाम में ‘सिंह’ होने को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कथित “कृपा” से जोड़ा गया और पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल खड़े किए गए। लेकिन घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई और आरोपी के पुराने रिकॉर्ड की पड़ताल करने पर वायरल नैरेटिव की तस्वीर अलग सामने आती है।
क्या है पूरा मामला?
शाहजहांपुर के खुदागंज थाना क्षेत्र के सूथा गांव के मंदिर परिसर में दो साधुओं गोपाल दास और बिहारी दास की हत्या कर शव जला दिए गए। पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया कि आरोपी सुमित सिंह मंदिर और उससे जुड़ी जमीन पर कब्जा करना चाहता था और साधुओं पर मंदिर छोड़ने का दबाव बना रहा था।
पुलिस ने कब और कैसे की कार्रवाई?
अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीणों से सुमित पर शक की जानकारी मिलने के बाद पुलिस उसके घर पहुंची और उसे पकड़ लिया। पुलिस के अनुसार सुमित ने हत्या की बात स्वीकार की और उसकी निशानदेही पर वारदात में इस्तेमाल लोहे की रॉड भी बरामद की गई।
आरोपी का पहले से है आपराधिक रिकॉर्ड
अमर उजाला और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार सुमित सिंह के खिलाफ पहले से करीब सात मुकदमे दर्ज थे। इनमें मारपीट, वाहन में आग लगाने, आर्म्स एक्ट और पशुओं को नुकसान पहुंचाने जैसे मामले बताए गए हैं। दिसंबर 2025 में वह आर्म्स एक्ट के मामले में जेल गया था और अगस्त 2026 में जमानत पर बाहर आया था।

क्या जाति के कारण पुलिस ने आरोपी को बचाया?
सोशल मीडिया पोस्ट में सुमित के ‘सिंह’ होने को सीधे मुख्यमंत्री की कथित जातीय राजनीति से जोड़ दिया गया। लेकिन उपलब्ध पुलिस बयान और प्रमुख मीडिया रिपोर्टों में ऐसा कोई दस्तावेज या जांच निष्कर्ष सामने नहीं आता, जिससे यह साबित हो कि पुलिस ने जाति के कारण आरोपी पर कार्रवाई नहीं की।

उलटे, इस मामले में पुलिस ने घटना सामने आने के कुछ ही समय बाद संदिग्ध आरोपी को गिरफ्तार किया और जांच शुरू कर दी। इंडियन एक्सप्रेस ने भी पुलिस के हवाले से आरोपी की गिरफ्तारी, उसके सात पुराने मामलों और मंदिर की संपत्ति पर कब्जे की आशंका का उल्लेख किया है।
Factgiri का निष्कर्ष: भ्रामक
घटना की जानकारी के बाद पुलिस ने आरोपी सुमित सिंह को उसके घर से गिरफ्तार किया, पूछताछ की और हत्या में इस्तेमाल रॉड बरामद की। साथ ही, आरोपी का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी सामने आया है। इसलिए इस मामले को “पुलिस ने कार्रवाई नहीं की” या सिर्फ जातीय संरक्षण के उदाहरण के तौर पर पेश करना भ्रामक है।




