Factgiri Fact Check: समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान भाजपा पर फर्जी फॉर्म-7 भरवाकर सपा समर्थकों के वोट कटवाने का आरोप लगाया है। लेकिन FactGiri की पड़ताल में सामने आया कि उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इन आरोपों का विस्तृत खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि संबंधित नामों पर फैसला जांच और सुनवाई के बाद लिया गया था।
अखिलेश यादव ने क्या आरोप लगाए?
अखिलेश यादव का आरोप है कि भाजपा से जुड़े लोगों ने निजी एजेंसियों और कार्यालयों के माध्यम से बड़ी संख्या में फॉर्म-7 भरवाए। उन्होंने सुल्तानपुर में नंदलाल निषाद के कथित फर्जी हस्ताक्षर और लखनऊ में दशरथ नाम से बड़ी संख्या में आवेदन जमा होने जैसे उदाहरण दिए। सपा का आरोप है कि उसके PDA समर्थक मतदाताओं को निशाना बनाया गया।
फॉर्म-7 से क्या तुरंत वोट कट जाता है?
चुनाव आयोग के अनुसार, फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम पर आपत्ति दर्ज करने या उसे हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि और पात्रता नहीं होने जैसे आधारों पर आवेदन किया जा सकता है। केवल फॉर्म जमा होने से नाम स्वतः नहीं कटता। निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) निर्धारित प्रक्रिया और आवश्यक जांच के बाद निर्णय लेता है।
फरवरी में चुनाव आयोग ने क्या बताया था?
17 फरवरी 2026 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने बताया कि उस समय तक फॉर्म-7 के आधार पर कुल 23,935 नाम हटाए गए थे। इनमें दूसरे व्यक्तियों की आपत्तियों के आधार पर 4,336 नाम हटाए गए। आयोग ने कहा कि किसी मतदाता का नाम केवल आपत्ति मिलने से नहीं हटता। निर्धारित जांच के बाद ही निर्णय लिया जाता है।

9 अक्टूबर की रिपोर्ट में क्या दावा हुआ?
The Reporters’ Collective ने दावा किया कि चुनाव आयोग के ERONET सॉफ्टवेयर से 85,854 ऐसे फॉर्म-7 तैयार हुए, जिनमें नाम हटाने का कारण दर्ज नहीं था। रिपोर्ट ने अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर, आवेदन की समयसीमा और तरबगंज तथा पीलीभीत में एक ही नाम से बड़ी संख्या में दर्ज आपत्तियों पर भी सवाल उठाए।
ABP News की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने इन आरोपों का खंडन किया। आयोग ने बताया कि लगभग 3.26 करोड़ मतदाताओं को रिकॉर्ड में विसंगतियों और अन्य कारणों से नोटिस जारी किए गए थे। संबंधित मतदाताओं को दस्तावेज प्रस्तुत करने और सुनवाई का अवसर दिया गया।

आयोग के मुताबिक, 85,854 फॉर्म-7 उन मतदाताओं से संबंधित थे जिन्हें जांच के बाद अपात्र पाया गया था। सॉफ्टवेयर में फॉर्म तैयार करने की व्यवस्था फैसलों का रिकॉर्ड रखने के लिए थी। आयोग ने इसे बिना जांच मनमाने ढंग से नाम हटाने का मामला मानने से इनकार किया।
सामूहिक फॉर्म-7 पर क्या जवाब मिला?
आयोग ने स्पष्ट किया कि तरबगंज और पीलीभीत में एक आवेदक द्वारा बड़ी संख्या में फॉर्म-7 भरने के जिन उदाहरणों का उल्लेख रिपोर्ट में था, उन सभी संबंधित आवेदनों को निरस्त कर दिया गया था। आयोग के अनुसार, एक व्यक्ति द्वारा 10 से अधिक आवेदन करने के 198 मामले सामने आए थे। इनसे कुल 4,740 नाम हटाने का प्रयास हुआ था।

FactGiri की पड़ताल का निष्कर्ष
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि SIR के दौरान फर्जी फॉर्म-7 भरवाकर सपा समर्थकों के वोट कटवाए गए। लेकिन उपलब्ध प्रमाणों से यह आरोप साबित नहीं होता। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 10 अक्टूबर को जारी स्पष्टीकरण में 85,854 फॉर्म-7 से बिना कारण नाम हटाने के दावे को भ्रामक और निराधार बताया।
वहीं, तरबगंज और पीलीभीत में बड़ी संख्या में दाखिल संदिग्ध आवेदन निरस्त किए गए। ऐसे में फॉर्म-7 के जरिए सपा समर्थकों के वोट सुनियोजित तरीके से कटवाने का दावा उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट नहीं होता।
FACTGIRI VERDICT: दावा अप्रमाणित। भ्रामक




