क्या योगी सरकार में डकैती का आरोपी बन गया इंस्पेक्टर? FactGiri की पड़ताल में मामला निकला एकदम उलटा

FactGiri Fact Check: सोशल मीडिया पर एक अखबार की कटिंग वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया गया है कि डकैती का मुकदमा दर्ज होने के बावजूद एक दरोगा को इंस्पेक्टर पद पर प्रमोशन मिल गया। इसे शेयर करते हुए एक यूजर ने लिखा, “ये योगी के यूपी में ही संभव है! FactGiri ने वायरल खबर की पड़ताल की तो अमर उजाला और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्टों में अलग समयक्रम सामने आया।

क्या है पूरा मामला?

मामला बाराबंकी के जिला अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (DCRB) में प्रभारी रहे इंस्पेक्टर अंगद प्रताप सिंह से जुड़ा है। अमर उजाला की 28 फरवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, अंगद प्रताप सिंह के खिलाफ 1999 में कानपुर के कर्नलगंज थाने में डकैती का मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मामले में 2 अक्टूबर 2002 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों सहित आरोपपत्र दाखिल किया गया था। आरोप है कि अंगद प्रताप सिंह ने पदोन्नति के समय अपना आपराधिक मुकदमा छिपाया और विभाग को गलत घोषणा पत्र दिया।

किस सरकार में मिला था इंस्पेक्टर का प्रमोशन?

यही इस वायरल दावे का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। अमर उजाला और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्टों के मुताबिक, अंगद प्रताप सिंह ने 2015-16 के दौरान फतेहपुर में तैनाती के समय विभाग को घोषणा पत्र दिया कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है।

इसके आधार पर 2016 में उन्हें सब-इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति मिली। उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी। योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2017 में मुख्यमंत्री पद संभाला था।

योगी सरकार के दौरान क्या कार्रवाई हुई?

अमर उजाला के मुताबिक, 22 अगस्त 2024 को आईजी स्थापना ने मामले की जांच के आदेश दिए। इसके बाद बाराबंकी के सीओ सदर हर्षित चौहान ने विभागीय जांच की। जांच में पदोन्नति के लिए आपराधिक मुकदमे की जानकारी छिपाने का मामला सामने आया।

जांच रिपोर्ट के आधार पर एसपी कार्यालय की प्रधान लिपिक मीना भाटिया ने शिकायत दी। इसके बाद फरवरी 2025 में बाराबंकी शहर कोतवाली में अंगद प्रताप सिंह के खिलाफ धोखाधड़ी और दस्तावेजों में जालसाजी से संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की गई। हिंदुस्तान टाइम्स की 1 मार्च 2025 की रिपोर्ट में भी इस कार्रवाई की पुष्टि की गई।

FactGiri का निष्कर्ष

समाचार रिपोर्टों के अनुसार, प्रमोशन 2016 में अखिलेश यादव सरकार के दौरान हुआ था, जबकि मामले की जांच 2024 में शुरू हुई और फरवरी 2025 में योगी सरकार के कार्यकाल में FIR दर्ज की गई। इसलिए 2016 में हुए प्रमोशन को योगी सरकार के कार्यकाल का बताना तथ्यात्मक रूप से गलत है।

FACTGIRI VERDICT: भ्रामक दावा। वायरल पोस्ट में वास्तविक समाचार की कटिंग को अधूरे राजनीतिक संदर्भ के साथ शेयर किया गया है। पदोन्नति और उसके खिलाफ हुई जांच अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल की घटनाएं हैं।

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